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दूसरे सप्तऋषि विश्वामित्र के बारे में 7 बातें जो आप नहीं जानते

ऋषि विश्वामित्र से जुडी 7 बातें जो शायद आप नहीं जानते

सप्तऋषियों में से एक है ऋषि विश्वामित्र वे कौन हैं आईये जानते हैं उनके बारे में। आज हम विस्तार से जानेंगे दूसरे सप्तऋषि विश्वामित्र के बारे में 7 बातें जो आप नहीं जानते।

पहली बात ) वे जन्म से क्षत्रिय थे। इनका नाम था विश्वरथ। प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। वे उन्हीं राजा गाधि के पुत्र थे। गायत्री माता ने प्रसन्न होकर इन्हें नाम दिया विश्वामित्र।

दूसरी बात ) जब वे राजा थे, और एक दिन अपनी रानी से चौसर में हार गए। तब इन्होने चौसर के पासो को ये कहकर तोड़ दिया की मुझे हार स्वीकार नहीं, चाहे खेल में ही क्यों न हो। इससे उनके हठी स्वाभाव का पता चलता है।

तीसरी बात ) वशिष्ठ ऋषि और विश्वामित्र ऋषि की प्रतिस्प्रधा सारा संसार जानता है। दो कथाएं, एक नंदिनी गाय के लिए हुआ युद्ध और दूसरी शेषनाग को निर्णायक बनाकर वशिष्ठ के साथ शास्त्रार्थ : इन दोनों पर हम ब्लॉग बना चुके हैं।

इनकी प्रतिस्प्रधा से जुडी एक और कथा आपको सुनाता हूँ । इक्ष्वाकु वंश में एक राजा हुये त्रिशंकु जो सशरीर स्वर्ग जाना चाहते थे अतः इसके लिये उन्होंने अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी से अनुरोध किया किन्तु वशिष्ठ जी ने इस कार्य के लिये अपनी असमर्थता जताई। त्रिशंकु ने यही प्रार्थना वशिष्ठ जी के पुत्रों से भी की। वशिष्ठ जी के पुत्रों ने कहा कि जिस काम को हमारे पिता नहीं कर सके तू उसे हम से कराना चाहता है। ऐसा प्रतीत होता है कि तू हमारे पिता का अपमान करने के लिये यहाँ आया है। वशिष्ठ जी के पुत्रों ने रुष्ट होकर त्रिशंकु को चाण्डाल हो जाने का शाप दे दिया।

Trishanku requesting Vishwamitraत्रिशंकु विश्वामित्र के पास गए और अपनी इच्छा बताई। विश्वामित्र ने कहा मैं तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण करूँगा। उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाकर आज्ञा दी कि वशिष्ठ के पुत्रों सहित वन में रहने वाले सब ऋषि-मुनियों को यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये निमन्त्रण दे आओ।

वशिष्ठ जी के पुत्रों ने यह कहकर उस निमन्त्रण को अस्वीकार कर दिया कि जिस यज्ञ में यजमान चाण्डाल और पुरोहित क्षत्रिय हो उस यज्ञ का भाग हम स्वीकार नहीं कर सकते। यह सुनकर विश्वामित्र जी ने क्रुद्ध होकर उन्हें सात सौ वर्षों तक चाण्डाल योनि में विचरण करने का शाप दे दिया और यज्ञ की तैयारी में लग गये।

यज्ञ की समाप्ति पर विश्वामित्र ने सब देवताओं को नाम ले लेकर अपने यज्ञ भाग ग्रहण करने के लिये आह्वान किया किन्तु कोई भी देवता अपना भाग लेने नहीं आया। इस पर क्रुद्ध होकर विश्वामित्र ने कहा कि हे त्रिशंकु! मैं तुझे अपनी तपस्या के बल से स्वर्ग भेजता हूँ। इतना कह कर विश्वामित्र ने मन्त्र पढ़ते हुये आकाश में जल छिड़का और राजा त्रिशंकु शरीर सहित आकाश में चढ़ते हुये स्वर्ग जा पहुँचे। त्रिशंकु को स्वर्ग में आया देख इन्द्र ने क्रोध में त्रिशंकु को स्वर्ग से नीचे फेक दिया। विश्वामित्र ने त्रिशंकु को हवा में ही रोक लिया और उसी स्थान पर अपनी तपस्या के बल से त्रिशंकु स्वर्ग की सृष्टि कर दी और नये तारे तथा दक्षिण दिशा में सप्तर्षि मण्डल बना दिया।


चौथी बात ) विश्वामित्र ब्राह्मण का पद प्राप्त करने के लिये कठोर तपस्या कर रहे थे ‌। तपस्या की अवधि समाप्त होने पर जब वे अन्न ग्रहण करने के लिए बैठे, तभी ब्राह्मण भिक्षुक के रूप में आकर इन्द्र ने भोजन की याचना की। विश्वामित्र ने सम्पूर्ण भोजन उस याचक को दे दिया और स्वयं निराहार रह गये। इन्द्र को भोजन देने के पश्चात विश्वामित्र के मन में विचार आया कि सम्भवत: अभी मेरे भोजन ग्रहण करने का समय नहीं आया है ,मुझे अभी और तपस्या करना चाहिये। इस बार उन्होंने प्राणायाम से श्वास रोक कर भीषण तप किया। इस तप से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें ब्राह्मण की उपाधि प्रदान की tab विश्वामित्र ने कहा कि मुझे ओंकार, षट्कार तथा चारों वेद भी प्रदान कीजिये। प्रभो! अपनी तपस्या को मैं तभी सफल समझूँगा जब वशिष्ठ जी मुझे ब्राह्मण और ब्रह्मर्षि मान लेंगे।विश्वामित्र की बात सुन कर सब देवताओं ने वशिष्ठ जी का पास जाकर उन्हें सारा वृत्तान्त सुनाया। वशिष्ठ जी विश्वामित्र के पास पहुँचे और उन्हें अपने हृदय से लगा कर बोले कि विश्वामित्र जी! आप वास्तव में ब्रह्मर्षि हैं। मैं आज से आपको ब्राह्मण स्वीकार करता हूँ।


vishwamitr giving curse to Rambhaपांचवी बात ) रम्भा ने जब इन्द्र के कहने पर, मद्द में चूर होकर विश्वामित्र की तपस्या भंग करनी चाहि तब विश्वामित्र ने श्राप देकर उसे पत्थर बना दिया। किन्तु जब मेनका ने विवाह प्रस्ताव रखा तब उस के संग 10 साल बिताए और उनकी एक पुत्री भी हुई शकुंतला, जिनका विवाह दुष्यंत से हुआ और उनके पुत्र हुए राजा भरत।

छठी बात ) राजा हरिश्चंद्र की कठोर परीक्षा लेने वाले ऋषि विश्वामित्र ही थे। और इन् पर हम अलग से ब्लॉग लिखेंगे।

सातवीं बात ) विश्वामित्र ही वसिष्ठ ऋषि से आग्रह करके राम लक्ष्मण को अपने साथ ले गए थे और तारका वध और बाद में राम -सीता विवाह के सूत्रधार बने ।

तो दोस्तों ये थी वे सात बातें जो ऋषि विश्वामित्र के बारे ने थी, उम्मीद करता हूँ आपको पसंद आयी होंगी

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